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12 कि.मी. का विहार कर देउलगांव राजा में पधारे तेरापंथ के सरताज

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दया, अनुकंपा और करुणा की भावना का हो विकास

मधुहीर राजस्थान

देउलगांव राजा, बुलढाणा (महाराष्ट्र) रमेश भट्ट। मानवीय मूल्यों की ज्योति लेकर जन-जन के मानस को ज्योतित करने को गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ शुक्रवार को महाराष्ट्र के और जिले बुलढाणा में मंगल प्रवेश किया। आचार्यश्री लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर बुलढाणा जिले के देउलगांव राजा में स्थित दीनदयाल विद्यालय में पधारे, जहां ग्रामवासियों ने शांतिदूत आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया।

शुक्रवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वाघ्रुल से गतिमान हुए। दिन चढ़ने के साथ ही सूर्यकिरणों की तपन से धरती तपने लगी। ऐसे में आरसीसी से बना हुआ राजमार्ग मानों किसी तवे के भांति गर्म हो उठा। उसके बावजूद भी मानवता के कल्याण के लिए समता साधक आचार्यश्री महाश्रमणजी अप्रभावित रूप से गतिमान थे। विहार के दौरान आचार्यश्री ने जालना जिले की सीमा को अतिक्रान्त कर बुलढाणा जिले की सीमा में पावन प्रवेश किया। इस जिले में आचार्यश्री का प्रथम प्रवास स्थल देउलगांव राजा बना।

विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालु जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में हिंसापूर्ण व्यवहार भी दिखाई दे सकता है और अहिंसापूर्ण साधना भी दिखाई दे सकती है। समरागंण में युद्ध बाद में होता है, पहले आदमी के दिमाग में युद्ध की कल्पना होती है। हिंसा की वृत्ति आदमी में होती है तो अहिंसा और अनुकंपा की चेतना भी देखी जा सकती है। दयावान आदमी कई पापों से अपने आपको सुरक्षित रख सकता है। हिंसा और अपराध दया के अभाव में होता है। जिसके मन में दया और अनुकंपा की चेतना है, व पापों से बच सकता है। दुःख का कारण पाप कर्म होता है। किए हुए पाप जब उदित होते हैं, तब आदमी कष्टानुभूति कर सकता है। आदमी पापों बचने का प्रयास करता रहे तो दुःख का मूल ही समाप्त हो सकता है।

आदमी यह सोचे कि मुझे दुःख अप्रिय है तो दूसरों को दुःख अप्रिय होता है। इसलिए यह प्रयास होना चाहिए कि अपने द्वारा किसी को कष्ट न दिया जाए। किसी दुःखी आदमी को आध्यात्मिक चित्त समाधि देने का प्रयास किया जाता है तो वह दया का रूप हो जाता है। आदमी के मन में दया, करुणा और अनुकंपा का भाव रहे, ऐसा प्रयास करना चाहिए। कोई-कोई पशु भी दयावान और अनुकंपावान हो सकते हैं। आचार्यश्री ने मुनि मेघ के पूर्व भव की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि जब पशुओं में दया की भावना देखने को मिल सकती है तो मनुष्य को और अधिक दया और अनुकंपा की भावना का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा, शांति, मैत्री से जितना काम हो सके, उसे करने का प्रयास करना चाहिए। बलप्रयोग और शस्त्रप्रयोग न हो ऐसा प्रयास होना चाहिए।

अहिंसा को भगवती कहा गया है। हिंसा की आग को अहिंसा रूपी अमृत से बुझाने का प्रयास करना चाहिए। दया, अनुकंपा और करुणा की भावना का विकास हो, ऐसा प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि आज यहां आना हुआ है। देउलगांव राजा में आए हैं। अपने मन को वश में करने वाला राजा होता है। जो स्वयं के मन को नियंत्रित कर सके, वह बड़ा राजा होता है। यहां के लोग भी खुद के मन को कंट्रोल में रखने वाले बने रहें। आचार्यश्री के स्वागत में श्रीमती रूपा माण्डोत, बालिका तृषा माण्डोत, दिगम्बर जैन समाज की ओर से श्री शांतिलाल दादा चिंगलकर, श्री मनीष कोटेकर, स्थानकवासी समाज की ओर से श्री उदय छाजेड़ ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी। देउलगांव राजा महिला मण्डल ने स्वागत गीत का संगान किया।

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