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तपस्या से कर्म निर्जरा करने का हो प्रयास : महातपस्वी महाश्रमण

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छत्रपति संभाजीनगर में तेरापंथाधिशास्ता ने किया 9 कि.मी. का विहार

छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र) रमेश भट्ट। जन-जन का कल्याण करने वाले, सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ छत्रपतिसंभाजीनगर में अक्षय तृतीया जैसे महनीय आयोजन के साथ पंचदिवसीय प्रवास हेतु पधार गए हैं। उनहत्तर वर्षों बाद भक्तों को तारने उनके आंगन में पधारे सुगुरु के दर्शन, सेवा व उपासना का लाभ प्राप्त करने के लिए हर श्रद्धालु उत्साहित नजर आ रहा है। बुधवार को प्रातःकाल युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गोलवाड़ी के नवनिर्मित तेरापंथ भवन से गतिमान हुए। विहार के साथ ही प्रारम्भ हुआ श्रद्धालुओं के निवास स्थान व प्रतिष्ठानों के समक्ष दर्शन व श्रीमुख से मंगलपाठ श्रवण का क्रम। तीखी धूप और गर्मी के बावजूद भी श्रद्धालुओं की भावनाओं को पूर्ण करते हुए आचार्यश्री को निर्धारित प्रवास स्थल तक पधारने में लगभग ग्यारह बज गए। एकदिवसीय प्रवास हेतु आचार्यश्री श्री सुभाषजी नाहर के निवास स्थान में पधारे। अपने आराध्य को अपने आंगन में पाकर नाहर परिवार अतिशय आह्लादित था।

छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित मंगल प्रवचन के दूसरे दिन युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि अध्यात्म की साधना में सम्यक् ज्ञान का महत्त्व है, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र का महत्त्व है तो तप का भी अपना महत्त्व होता है। तपस्या के द्वारा आत्मा की शुद्धि होती है। तपस्या के भी बारह प्रकार बताए गए हैं, किन्तु कहा गया है कि शुभ योग में रहना भी तपस्या होती है। आज वैशाख कृष्णा अमावस्या है। अक्षय तृतीया का दिन भी निकट है। यह दिन तपस्या की संपन्नता का दिन है। कितने लोग आज के दिन अपने वर्षीतप को सम्पन्न करते हैं। वह दिन प्रथम जिनेन्द्र भगवान ऋषभ से जुड़ा हुआ है।

अक्षय तृतीया भगवान ऋषभ से जुड़ा हुआ है और अक्षय तृतीया का भी अपना महत्त्व है। यह दिन वर्षीतप की सम्पन्नता का दिन है तो कितने उसी दिन से वर्षीतप प्रारम्भ भी कर देते हैं। तपस्या में थोड़ा कष्ट भी हो सकता है, किन्तु तपस्या निर्मलता को प्रदान करने वाली होती है। अनाहार की तपस्या सबके अनुकूल न हो तो अनेक प्रकारों से तपस्या होती है और इससे कर्म निर्जरा भी की जा सकती है। लम्बी-लम्बी तपस्या करने वालों को साधुवाद है। तपस्या के साथ यदि कषायों की मंदता हो जाए और कभी इससे मुक्ति मिल जाए तो बहुत बड़ी बात हो सकती है। तपस्या के द्वारा कर्म निर्जरा करने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री ने आगे कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ की आचार्य परंपरा में सबसे पहले महाराष्ट्र की यात्रा करने वाले आचार्यश्री तुलसी हुए और औरंगाबाद पधारने वाले भी पहले आचार्य थे। आगम संपादन के प्रारम्भ की घोषणा के इतिहास से यह धरती जुड़ी हुई है। आगम का काफी काम हुआ है और अभी भी वर्धमान और गतिमान है। आचार्यश्री ने नाहर परिवार को धार्मिक-आध्यात्मिक सेवा करते रहने का मंगल आशीर्वाद भी प्रदान किया। आचार्यश्री के स्वागत में श्रीमती ललिता नाहर ने अपनी अभिव्यक्ति दी। नाहर परिवार ने स्वागत गीत का संगान किया।

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