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उनहत्तर वर्षों की आध्यात्मिक प्यास बुझा गतिमान हुए ज्योतिचरण

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11 किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री पहुंचे वरुलकाजी चिकलथान

वरुलकाजी चिकलथान, छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र)। छत्रपति संभाजीनगर में तपस्या की प्रेरणा व जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ से जुड़े हुए अक्षय तृतीया सहित पंचदिवसीय प्रवास सुसम्पन्न कर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, राष्ट्रसंत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने छत्रपति संभाजीनगर से रविवार को प्रातःकाल की मंगलबेला में गतिमान हुए। उनहत्तर वर्षों के बाद ऐसे सौभाग्य के उपरान्त जन-जन अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता का भाव लिए उपस्थित था। भक्तों की भावनाओं के साथ मानों प्रकृति भी जुड़ रही थी, तभी तो आसमान से विहार के प्रारम्भ में हल्की बूंदाबांदी भी हुई। सभी को अपने मंगल आशीष से आच्छादित करते हुए निर्मोह भाव से निकल पड़े। अपने आराध्य को विदा करने के लिए साथ चल पड़े। आज भी विहार के दौरान मार्ग में अनेक स्थानों पर आचार्यश्री ने अपने चरण थाम-थामकर श्रद्धालुओं को मंगलपाठ आदि से आच्छादित किया।

लगभग 11 किलोमीटर का विहार कर युगप्रधान आचार्यश्री वरुलकाजी चिकलथान में स्थित ओयेस्टर कॉलेज ऑफ फिजियोथेरापी में पधारे। परम पूजनीय आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को उद्बोधित करते हुए कहा कि आदमी अकेला जन्म लेता है और अकेला ही एक दिन अवसान को प्राप्त हो जाता है। आदमी अपने-अपने कर्मों के हिसाब से आए हैं, कर्म फल भोगते हैं और एक दिन अवसान को प्राप्त हो जाते हैं। सृष्टि का नियम है कि अपना कर्म स्वयं को ही भोगना होता है। हमें दुर्लभ मानव जीवन प्राप्त है। आदमी को इस मानव जीवन का सदुपयोग करते हुए आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए। आदमी को धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। कितनी भी कठिनाई हो, कैसी भी परिस्थिति आए, आदमी को धर्म के मार्ग को छोड़ना नहीं चाहिए। आदमी को धर्म के मार्ग पर ही चलने का प्रयास करना चाहिए।

भगवान महावीर के जीवनकाल में कितने परिषह आए थे। आदमी उनके समान न भी सहन कर सके तो कम से कम उनके समान सहन का प्रयास करना चाहिए। चाहे पारिवारिक समस्या आए, चाहे शारीरिक समस्या आए, किसी भी परिस्थिति में धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। आदमी अपने जीवन में यह भी ध्यान दे कि इस जन्म के बाद आगे के लिए धन आदि नहीं जा सकता। इसलिए धनार्जन के लिए पापकर्म में लिप्त होने से बचने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए आदमी को पापकर्म से बचते हुए धर्म के पथ पर आगे बढ़ते हुए अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करें। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने विद्या संस्थान को आशीष प्रदान करते हुए कहा कि यहां विद्या के साथ विनय और विवेक का संस्कार भी विद्यार्थियों को प्राप्त होता रहे।

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