गुरु पूर्णिमा विशेष
मधुहीर राजस्थान
जैसलमेर (सी आर देवपाल म्याजलार)। जैसलमेर गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक पावन पर्व है जो ज्ञान शिक्षण और मार्गदर्शन के प्रतीक गुरु को समर्पित होता है। यह दिन गुरु-शिष्य परंपरा को सम्मान देने और अपने जीवन में गुरु के योगदान को याद करने का उत्तम अवसर होता है। जैसलमेर में रियासत काल से गुरु शिष्य की परम्परा का निर्वहन होता आया हैं सनातन धर्म में गुरु को ईश्वर से पहले का दर्जा दिया गया हैं जैसलमेर में गुरु पूर्णिमा के दिन यहां के विख्यात मठों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहेगी जैसलमेर में रियासत कालीन ख्यातिनाम मठों के प्रति आज भी प्रगाढ़ आस्था और श्रद्धा की झलक मिलती हैं जैसलमेर के विख्यात मठों में आसरी मठ गजरूप सागर गुलाब सागर देव चंद्रेश्वर कपूरिया महादेव मठ संतोष भारती का मठ बालेटा धाम मोहनगढ़ मठ ख्याला म्याजलार अजबपुरी बाबा का मठ सहित कोई डेढ़ दर्जन मठो के प्रति आज भी आमजन में श्रद्धा का भाव हैं गुरु पूर्णिमा को इन मठों में पांव रखने की जगह नहीं होती सूरज की पहली किरण के साथ मठो के गुरुओ के प्रति श्रद्धा का दौर शुरू होता हे जो देर रात तक चलता हैं।
जैसलमेर आसरी मठ

जैसलमेर शहर में स्थित आसरी मठ के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा हे आमजन में यह मठ जैसलमेर के राजपरिवार से जुड़ा हैं राजपरिवार में राजतिलक की परम्परा में इस मठ के गादीपति की रहती हैं राजपरिवार के सदस्य गुरु पूर्णिमा को इस मठ में गुरु पूजन के लिए आते हैं आसरी मठ रियासतकालीन राज गुरुद्वारा है जो जैसलमेर की स्थापना के साथ स्थापित है। इस मठ में आज तक सभी महंत अविवाहित पुरुष हुए हैं, इसी कड़ी में दिवंगत महंत शिव सुखनाथ के बाद त्रिलोकनाथ महंत व मठाधीन नियुक्त हैं।चूँकि महंत त्रिलोकनाथ अवयस्क हे तो उनके बालिग होने तक धनिया नाथ को भी महंत बना रखा हैं दिवंगत महंत शिव सुखनाथ के प्रति राजपरिवार सहित आमजन में प्रगाढ़ आस्था थी।
गजरूप सागर मठ

जैसलमेर में स्थित एक प्रसिद्ध मठ है, जो लगभग 1500 साल पुराना माना जाता है. यह मठ जैसलमेर शहर के बसने से भी पहले का बताया जाता है और कहा जाता है कि इस मठ ने शहर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है नगर के निकट गजरूप सागर में स्थित प्राचीन नागा देव भारती महाराज के ठिकाने गजरूप सागर मठ के वर्तमान मठाधीश बाल भारती महाराज हैं गजरूप सागर का निर्माण महारावल गजसिंह ने कराया था।गजरूप सागर के पास स्थित पहाड़ी पर देवी स्वागिया जी का मंदिर हैं।मठ में द्वादश ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं वही नागा महंतो की तपोभूमि के रूप में विख्यात हैं ,इस मठ के प्रति आमजन में गहरी आस्था हैं गुरुपूर्णिमा को मठ में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता हैं इस मठ मान्यता का अंदाज़ इसी बात से लगा जा सकता हे की अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में इस मठ से पवित्र मिटटी कलश का उपयोग हुआ था।
मठ ख्याला म्याजलार

जैसलमेर में ख्याला मठ अपनी अलग पहचान बना चुका है। यह मठ मुख्य मठ नहीं होकर मुख्य मठ की शाखा है। मुख्य मठ पाकिस्तान का रताकोट मठ है। जहां आज भी हिंदू व मुस्लिम समान रूप से पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं। इससे पहले इन दोनों मठों की पूजा एक साथ होती थी। जिसके मठाधीश भी एक ही होते थे। लेकिन 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान अलग होने से दोनों मठों के देश भी अलग हो गए। ऐसे में मठाधीश ख्याला मठ में ही रह गए।मौजूदा समय में ख्याल मठ के गादीपति महंत गोरखनाथ है गोरखनाथ के प्रत्ति क्षेत्र ही नहीं देश विदेशों में आस्था का ज्वार उमड़ता हैं महाशिवरात्रि को मठ के गादीपति का स्वर्ण मुकुट पहनाकर सम्मान होता हैं।वहीं इसकी मुख्य शाखा पाकिस्तान में ही रह गई। गौरतलब है कि अमरकोट के राणा वीसा ने महंत वीरनाथ को अपना गुरु बनाया था। जिसके बाद राणा ने उन्हें अमरकोट के पास ही मठ बनाने का निवेदन किया। जिस पर महंत वीरनाथ ने 1604 ईस्वी सन में पाकिस्तान में रताकोट का निर्माण किया। आठवें मठाधीश के रूप में 1815 ईस्वी सन में महंत सहैजनाथ बने। जिसके बाद वे बैशाखी तीर्थ में स्नान करने जैसलमेर आए। उस समय जैसलमेर व बीकानेर के बीच बासनपीर का युद्ध चल रहा था। जिस पर महारावल गजेसिंह दर्शन करने पहुंचे तथा उन्होंने आशीर्वाद मांगा। जिस पर महंत सहैजनाथ ने उन्हें जीत का आशीर्वाद देकर सोढ़ा राजपूतों को युद्ध में साथ भेजा।तब युद्ध में महारावल गजेसिंह ने महंत सहैजनाथ को विशाल रूप में युद्ध करते हुए देखा। युद्ध में जैसलमेर की जीत हो गई। जिसके बाद महारावल ने महंत को जैसलमेर में ही मठ बनाने का निवेदन किया। जिसके बाद महंत सहैजनाथ ने ख्याला नामक भील से जगह लेकर उसी के नाम से मठ की स्थापना 1829 ईस्वी सन में फाल्गुन माह की महाशिवरात्री को की।
देव चंद्रेश्वर महादेव

जैसलमेर शहर में स्थित देव चंद्रेश्वर महादेव मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा हे आमजन में सावन महीने महाशिवरात्रि सहित अनेक पर्वों पर बड़े आयोजन होते हैं हजारो श्रद्धालु शिरकत करते हैं किले के पास स्थित शिव रोड पर पुराना रेत का टीला था इस टाइल के नीचे देव चन्द्रश्वर महादेव मंदिर कोई चार सौ साल पहले प्रगट हुआ था राजपरिवार ने इसी स्थान पर चंद्रेश्वर महादेव का मंदिर स्थापित कर दिया इस मंदिर के प्रति पुराने समय से श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा रही ,इस मंदिर में महंत मदननाथ की गादी हे मदन नाथ के बाद चंदू भारती जी चंदू भारती जी के बाद वर्तमान में उनके शिष्य श्री भगवान् भारती जी महंत हैं गुरु पूर्णिमा के दिन शहरी तथा ग्रामीण इलाको से हजारो श्रद्धालु पहुंचते हैं महंत श्री भगवान भारती तीन साल पहले हरिद्वार से कावड़ जैसलमेर तक 14 सौ किलोमीटर पैदल सफर तय लाये थे उसके बाद उन्होंने से जैसलमेर से अयोध्या श्रीराम मंदिर तक तक पैदल यात्रा की थी गत सावन महीने में उन्होंने खड़े रहकर तीस दिन तपस्या की गुरु पूर्णिमां को मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती हैं।
गुलाब सागर मठ

जैसलमेर में गुलाब सागर मठ एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह मठ 300 साल पुराना है यह मठ महंत देवपुरी जी तपोभूमि के रूप में विख्यात हैं आमजन की इस मठ के प्रति अगाध श्रद्धा हैं यहां के महंत ब्रह्मपुरी महाराज का गत महीनो में भीलवाड़ा में एक सड़क हादसे में निधन हो गया जिसके बाद मठ के नए गादीपति ब्रह्मपुरी जी के शिष्य श्री शिव पूरी को गुलाब सागर मठ जैसलमेर शहर के बीच में रेलवे स्टेशन के पास स्थित है।
बालेटा धाम

जैसलमेर में बालेटा धाम जिसे भूरा बाबा का मंदिर भी कहा जाता है एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह जैसलमेर शहर के पास सुथारमंडी गाँव वर्तमान बालेटा धाम में स्थित है यह मंदिर रेतीले धोरों पर बना है और यहाँ भूरा बाबा की पूजा की जाती है. ऐतिहासिक रूप से यह स्थान मोहनगढ़ से आए किसानों के लिए विश्राम स्थल के रूप में भी जाना जाता था श्री निरंजन भारती गादीपति हैं इस मठ से क्षेत्र के किसानों की आस्था जुडी हैं भूरिया बावा की दूज पर विशाल मेला लगता हैं।
हेमशाही कपूरिया मठ

श्री श्री 1008 छगनपुरी महाराज की तपोभूमि कपूरिया मठ को हेमशाही मठ के नाम से भी जाना जाता है कपूरिया मठ जैसलमेर जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। कपूरिया मठ 16 जीवित समाधियों के लिए जाना जाता है यह जिला मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर है और देवीकोट से 35 किलोमीटर दक्षिण दिशा में डामर रोड से जुड़ा हुआ है हर 6 महीने में यहां मेला भरता है समाधि स्थल पर भाद्रपद शुक्ल दूज और आश्विन शुक्ल दूज को वर्तमान में महंत श्री वीरमपुरी जी इसके गादीपति हैं।
जैसलमेर संतोषपुरी मठ

यह स्थान जैसलमेर से पेंतीस किलोमीटर दक्षिण पूर्व उगवा गाँव नरसिंगों की ढाणी नामक स्थान के नज़दीक है जो की अच्छे तरीक़े सड़क मार्ग से जुड़ा हैं। महंत संतोष पुरी जी ने यह तालाब पहाड़ के एक पत्थर को खोदकर बनाया इस मठ का निर्माण भी अकेले तपस्वी संतोषपुरी महाराज ने किया जहां वर्षा का पानी पठार पर बने नालों के माध्यम से आता है और रेगिस्तान में एक रहस्यमयी बगीचा बनाता है।यह मठ प्राकृतिक खूबसूरती का अभिन्न अंग हैं ग्रामीण अंचलो में इस मठ के प्रति अगाध श्रद्धा हैं।

