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रूप, सत्ता व ज्ञान का ना करे अहंकार : युगप्रधान आचार्य महाश्रमण शांतिदूत ने दी घमंड से दूर रहने की प्रेरणा

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9 किमी विहार कर गुरुदेव पधारे चित्ते पिंपलगांव दो वर्षों पश्चात गुरु सन्निधि में पहुंचे मुनि द्वय चित्ते पिंपलगांव, छत्रपति संभाजीनगर

(महाराष्ट्र) (रमेश भट्ट)। अहिंसा यात्रा द्वारा जन मानस में सद्भावना, नैतिकता एवं नशामुक्ति की अलख जगाने वाले। देश विदेश में भ्रमण कर जनता को सन्मार्ग की राह दिखाने वाले शांतिदूत युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के छत्रपति संभाजीनगर यानी औरंगाबाद पदार्पण में अब कुछ पड़ाव ही शेष है। चरैवेति चरैवेति के सूत्र के साथ पदयात्रा करते हुए आचार्यश्री गांव–गांव, नगर–नगर में विचरण करा रहे है। आज सुबह आडुल गांव से गुरुदेव ने मंगल प्रस्थान किया। स्थानीय श्रद्धालुओं ने निवेदन पर गुरुदेव आधा किमी का अतिरिक्त पथ लेकर गांव के भगवान महावीर जैन मंदिर में पधारे एवं श्रावक समाज की अपने आशीष से कृतार्थ किया। तत्पश्चात विहार मार्ग के दौरान कुछ स्थानकवासी श्रमण संघ की साध्वियों ने गुरुदेव के दर्शन किए। गुरुदेव उन्हें प्रेरणा प्रदान कर पुनः गतिमान हुए। रविवार और औरंगाबाद की दूरी कम होने से आज विहार में श्रावक समाज की उपस्थिति निरंतर बढ़ती जा रही थी। लगभग 9 किमी विहार कर गुरुदेव चित्ते पिंपलगांव पधारे जहां स्वामी विवेकानन्द उच्च माध्यमिक विद्यालय में गुरुदेव का प्रवास हुआ। आज लगभग दो वर्षों के अंतराल के बाद बहिर्विहार से समागत मुनि पुलकित कुमार जी ठाणा–2 भी आज गुरु सन्निधि में पहुंचे।

मंगल प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा – आदमी में अनेक वृतियां होती है जैसे गुस्सा, अहंकार, माया और लोभ है। ये चारों कषाय कहे जाते है। राग और द्वेष इन दोनों में ये चारों कषाय समाविष्ट हो जाते हैं। कोई अच्छी बात बताएं और शिक्षा दे तो उसे शांति के साथ सुनें व ग्रहण करने का प्रयास करें, उस व्यक्ति गुस्सा नहीं करें और यह न सोचें की यह मुझे क्या शिक्षा दे रहा हैं। घमंड नाग की तरह फुफकारता है। ज्ञान का कोई अहंकार न हो। थोड़ा जान लिया तो व्यक्ति हाथी की तरह मदान्ध हो गया, ज्ञानांध हो गया लेकिन जब ज्ञानियों के सम्पर्क में आया तो लगता है कि मैं तो अज्ञानी हूँ, अल्पज्ञानी हूँ। कोई भी नया ज्ञान मिले तो उसे शालीनता से ग्रहण कर लेना चाहिए। व्यक्ति सोचे कि मेरे पास जितना ज्ञान है वह तो अल्प है, और मिले तो उसे लेता जाऊं। गुरुदेव ने आगे कहा कि पैसे का भी अहंकार ना हो ना ही उस पर मोह व ममत्व का भाव हो। पैसे के दुरूपयोग से व्यक्ति को बचना चाहिए। रूप व चेहरे की सुंदरता का भी धमंड नहीं करना चाहिए। यह सब तो पुद्गल है। आज जो चेहरा सुंदर है, हो सकता है कुछ समय बाद उतना सुंदर ना भी रहे। सुन्दरता व रूप से ज्यादा महत्व है शरीर की सक्षमता का, उस पर ध्यान देना चाहिए। व्यक्ति सत्ता में रहता है। वहां सत्ता व अधिकार का सही उपयोग हो तो वह उपहार बनती है नहीं तो वह भार समान है। मिलने के बाद उसका सम्यक उपयोग नहीं होता तो फिर वह धिक्कार बन जाता है। विनय से अहंकार का नाश हो है। अपेक्षा है व्यक्ति सदा विनयशीलता का विकास करता रहे। इस अवसर पर मुनि पुलकित कुमार जी, मुनि आदित्य कुमार जी ने अपने भावों की अभिव्यक्ति दी। महाराष्ट्र विधानसभा के पूर्व सभापति नाना हरिभाऊ बागड़े ने परिसर में पदार्पण पर गुरुदेव के स्वागत में विचार रखे। औरंगाबाद महिला मंडल ने गीत का संगान किया।

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