मधुहीर राजस्थान
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। हाईकोर्ट में कार्मिक की मृत्यु के समय गर्भावस्था में रहे शिशु के बालिग होने पर प्रस्तुत अनुकम्पा नियुक्ति के आवेदन को राज्य सरकार की ओर से देरी के आधार पर अस्वीकार किए जाने के मामले में सुनवाई हुई। जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण ने इस मामले में प्रारंभिक सुनवाई के बाद शिक्षा विभाग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।
दरअसल, डीडवाना के बेरी गांव निवासी समीर खान की ओर से एडवोकेट रजाक खान हैदर ने याचिका दायर की। इसमें बताया कि समीर के पिता सुलेमान खान का वर्ष 2003 में निधन हो गया था। उस समय याचिकाकर्ता समीर खान अपनी मां के गर्भ में था। पिता की मृत्यु के बाद उसकी मां लंबे समय तक बीमार रही और बड़ा भाई नि:शक्त है, ऐसे में बालिग होने पर याचिकाकर्ता ने अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। आवेदन पर प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय ने कार्मिक की मृत्यु के समय याचिकाकर्ता के जन्म नहीं लेने के कारण उसे आश्रित की श्रेणी में मानने या नहीं मानने को लेकर शिक्षा विभाग से मार्गदर्शन चाहा था। इस प्रश्न पर निदेशालय स्पष्टता नहीं ले पा रहा था कि क्या गर्भावस्था में रहे शिशु को मृतक कार्मिक का आश्रित माना जाए या नहीं। शिक्षा विभाग ने निदेशालय के प्रति उत्तर में शीर्ष अदालत की ओर से पारित दो निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि कार्मिक की मृत्यु के कई वर्षों बाद अनुकम्पा नियुक्ति का आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस आधार पर याचिकाकर्ता के आवेदन को देरी के कारण अस्वीकार कर दिया गया।
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के उमेश कुमार नागपाल बनाम हरियाणा राज्य मामले में दिए निर्णय की गलत व्याख्या कर रही है। वकील ने कहा कि उक्त मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि संकट समाप्त होने या लंबे समय बाद नियुक्ति का दावा नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता के मामले में संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है। कार्मिक का परिवार अभी भी आर्थिक कठिनाई से जूझ रहा है। मृतक की पत्नी के बीमार होने और बड़े पुत्र के नि:शक्तजन होने की विषम परिस्थितियां राजस्थान मृत सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों की अनुकम्पा नियुक्ति नियम के तहत 90 दिन की परिसीमा अवधि में शिथिलता प्रदान करने के लिए पर्याप्त और न्यायोचित है। अधिवक्ता हैदर ने कहा कि याचिकाकर्ता की परिस्थितियां इन दोनों प्रकरणों के समान नहीं हैं। सरकार की ओर से दोनों प्रकरणों के तथ्यों पर विचार किया जाए, बिना उनके निष्कर्षों को याचिकाकर्ता के प्रकरण पर लागू करना मौलिक, संवैधानिक और विधिक अधिकारों का हनन है। वकील ने तर्क दिया कि जन्म से लेकर बालिग होने तक की अवधि की देरी स्वाभाविक और प्राकृतिक देरी है। इस अवधि को शिथिलता प्रदान करना उचित और न्यायसंगत है। याचिकाकर्ता को उस देरी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जो उसके नियंत्रण में नहीं थी।

