कई कालोनी,चौक, हॉस्पिटल नगर सहित लोकमत का मुख्यालय भी ज्योतिचरण से हुआ ज्योतित
छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र) रमेश भट्ट। उनहत्तर वर्षों से पालित सपने जब हकिकत बने तो जन-जन के नेत्र श्रद्धा भाव व प्रसन्नता के जल से सजल हो उठे। अपने आराध्य के दर्शन, आशीष व सेवा के लिए श्रद्धालु मानों उमड़ पड़े हैं। छत्रपति संभाजीनगर में अध्यात्म की गंगा को प्रवाहित करने व तपस्या के महोत्सव अक्षय तृतीया जैसे महनीय आयोजन के लिए पधारे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को नाहर परिवार के निवास स्थान से गतिमान हुए। आज आचार्यश्री यहां के शेष त्रिदिवसीय प्रवास व अक्षय तृतीया महोत्सव के लिए निर्धारित प्रवास स्थल प्रेसिडेंट बैंक्वेट लांस की ओर अपने सुपावन चरण बढ़ा रहे थे। मार्ग में स्थान-स्थान पर श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति उनके श्रद्धा भावों को दर्शा रही थी। हर वर्ग और समुदाय महामानव के दर्शन व आशीष को लालायित था। विहार के दौरान चिंतामणि कॉलोनी, औरंगपुरा, गुलमण्डी, सराफा बाजार, वीआईपी रोड, तेरापंथ भवन जाफर गेट, जालना रोड, हृदयम हॉस्पिटल, महावीर हॉस्पिटल व गरवारे चौक होते हुए ज्योतिचरण से महाराष्ट्र का चर्चित अखबार लोकमत का मुख्यालय भी पावनता को प्राप्त हुआ। अपने मुख्यालय में आचार्यश्री के दर्शन कर लोकमत परिवार अतिशय आह्लादित था। सभी को अपने आशीष से आच्छादित करते हुए नगर में स्थित जैन मंदिर में भी पधारे। इस प्रकार जन-जन को व स्थान-स्थान को पावन करते हुए तेरापंथ के अधिशास्ता आचार्यश्री प्रेसिडेंट बैंक्वेट लांस में शेष त्रिदिवसीय प्रवास के लिए पावन प्रवेश किया।

इस परिसर मंे आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित विशाल जनमेदिनी को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि आगम से कल्याणीवाणी प्राप्त होती है। यह धरती परम पूजनीय आचार्यश्री तुलसी द्वारा आगम संपादन के शुभारम्भ की घोषणा से जुड़ी हुई है। आज उनहत्तर वर्षों के बाद भी आगम का कार्य गतिमान है। आचार्यश्री तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के साथ अनेकों लोग इस कार्य से जुड़े हुए हैं। एक भगीरथ कार्य जो काफी हुआ है, अभी कुछ शेष भी है। इन आगमों से अनेक ज्ञान, शिक्षा, अध्यात्म व तत्त्वदर्शन की बातें हमें प्राप्त होती हैं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ में बत्तीस आगम मान्य हैं। इनमें एक है उत्तराध्ययन। इसके दसवें अध्याय में कहा गया है कि समय मात्र भी प्रमाद न हो। इसमें बताया गया कि यह जीवन अनित्य है, इसलिए आदमी को समय मात्र भी प्रमाद करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। चौरासी लाख जीव योनियों में दुर्लभ मानव जीवन प्राप्त है, उसका सद्गति के लिए अध्यात्म, धर्म व तपस्या में जीवन जीने का प्रयास करें।
अक्षय तृतीया का कार्यक्रम अब सामने हैं। भगवान ऋषभ की कठोर तपस्या से जुड़ा हुआ दिन है। बारह महीनों से अधिक समय तक खाने-पीने से वंचित रहकर साधना व तपस्या की। उनकी तपस्या की पूर्णता से जुड़ा दिन है। कितने-कितने तपस्वी अपने वर्षीतप की सम्पन्नता कर करेंगे और कई लोग आगे की तपस्या से भी जुड़ जाएंगे। भगवान ऋषभ के कुछ अंशों में अनुकरण के रूप में यह क्रम बना हुआ है। यह कार्यक्रम गुरुकुलवास सहित अनेक स्थानों पर भी आयोजित होता है। गृहस्थ जीवन में भी यदि अखण्ड वर्षीतप व नियम आदि का पालन हो रहा है तो बहुत अच्छी बात है। इस प्रकार इस धार्मिक-आध्यात्मिक रूप में इस मानव जीवन का लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती द्वारा ‘अनुत्तरवायिओदसाओ’ आगम लोकार्पित किया गया। इसके साथ शासन गौरव साध्वी कनकश्रीजी की आत्मकथा को भी लोकार्पित किया गया। अक्षय तृतीया व्यवस्था समिति की ओर से डॉ. अनिल नाहर ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपने आराध्य के समक्ष अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी।


